आज तीज की पावन बेला,
मंगल दीप जलाएँ,
मन-मंदिर में शिव-शंकर को
श्रद्धा से बसाएँ।
मेहँदी रची हथेली बोले,
सजनी का श्रृंगार,
नयनों में विश्वास सजा है,
हृदय में पावन प्यार।
पार्वती ने जिस प्रेम हेतु
कठिन तपस्या की,
अपने दृढ़ संकल्प से जिसने
हर बाधा लघु की।
वन-वन भटकी, धूप सही,
त्यागे सुख-संसार,
तप की अग्नि में निखर गया
उनका अमर प्यार।
न माँगा कोई वैभव उनसे,
न माँगा अधिकार,
केवल शिव को पाने की थी
मन में एक पुकार।
अटल रही वह प्रेम-साधना,
अडिग रहा विश्वास,
तब कैलाश स्वयं झुक आया
लेकर प्रेम-विलास।
आज उसी आदर्श प्रेम की
ज्योति मन में धरती,
हर सुहागिन अपने जीवन में
मंगल-कामना करती।
शिव-सा धीरज, पार्वती-सा
अटल रहे अनुराग,
सुख में हँसता साथ मिले और
दुःख में बने सुहाग।
रिश्ते केवल वचन नहीं हैं,
ये मन के विश्वास,
एक-दूसरे की पीड़ा को
समझे बिना कहे पास।
आज तीज पर यही प्रार्थना—
सजता रहे संसार,
हर आँगन में प्रेम खिले और
हर मन में हो प्यार।
नारी के इस मौन तपस्या को
मिले सदा सम्मान,
उसके त्याग और समर्पण का
हो जग में गुणगान।
शिव-पार्वती के पावन जैसा
निर्मल हो हर साथ,
जीवन की हर कठिन डगर में
थामे रहें दो हाथ।
तीज तभी तो पूर्ण कहाएँ,
जब मन हो निष्काम,
प्रेम रहे विश्वास से उजला,
जीवन हो सुखधाम।
व्रत रहे तो प्रेम का हो,
पूजा हो विश्वास—
शिव-पार्वती-सा अटूट रहे
हर जीवन का साथ।
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