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हर सुबह नई आस...

                
                                                         
                            हर सुबह नई आस...
                                                                 
                            

हर सुबह नई आस—
तुम्हारा कोई संदेश आए या न आए,
मैं फिर भी
तुम्हारे नाम की खिड़की
धीरे से खोल देती हूँ।

जानती हूँ,
प्रेम का कोई निश्चित समय नहीं होता,
फिर भी
हर सुबह
मन की देहरी पर
एक उम्मीद चुपचाप आ बैठती है।

कभी
फ़ोन की हल्की-सी ध्वनि में,
कभी
हवा के अनजाने स्पर्श में,
कभी
भीड़ से गुज़रते किसी चेहरे में,
मैं अनायास
तुम्हारी आहट सुनने लगती हूँ।

लोग कहते हैं—
प्रतीक्षा बहुत थका देती है;
पर मैं जानती हूँ,
सच्चा प्रेम
थकाता नहीं,
भीतर एक दीप
जलाए रखता है।

मैंने अब
शिकायतों को
अपने तकिए के नीचे रख छोड़ा है,
और विश्वास को
अपनी पलकों पर सजा लिया है;
क्योंकि
हर रिश्ता
हर दिन शब्द नहीं माँगता,
कभी-कभी
एक मौन भी
पूरी बातचीत बन जाता है।

यदि आज भी
तुम्हारा कोई संदेश न आए,
तो भी
मैं उदास नहीं होऊँगी;
मैं अपने मन से कहूँगी—
प्रेम का सबसे सुंदर उत्तर
कभी-कभी
समय स्वयं लिखता है।

हर सुबह नई आस—
यही विश्वास मुझे
हर दिन फिर से
तुम्हें प्रेम करने का
साहस दे जाता है।
- अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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