हरित धरती का गान
अरुण-किरण का स्वर्णिम आँचल
उतरा खेतों की देहरी पर,
हरित तरंगों-सी गा उठी धरा
नवजीवन की चौखट पर।
ओस-बूँद के नन्हे दर्पण में
झलके नभ का निर्मल मुख,
पवन सुनाए मृदुल वीणा-स्वर,
जाग उठे सुप्त जीवन-सुख।
धान-बालियाँ लजवन्ती-सी
मंद-मंद शीश नवाएँ,
मानो नवयौवना-सी प्रकृति
मौन प्रणय के गीत सुनाए।
सरसों ने पीताम्बर ओढ़ा,
हँस दी धूप सुवर्ण सलोनी,
अलसी की नीलिम चितवन में
डूबी गगन-छवि मनमोहिनी।
हल की सीधी रेखाओं में
भाग्य-लिपि अंकित हो जाती,
श्रम-बूँदों से सिंचित आशा
स्वर्णिम फसलों में मुस्काती।
किसान नहीं केवल अन्नदाता,
धरती का मौन उपासक है;
उसके श्रम की तप्त प्रार्थना से
ऋतुओं का प्रत्येक श्वास महकता है।
हे हरित खेत! तेरे आँचल में
भारत का विश्वास पला है,
तेरी सौंधी माटी में अब भी
जीवन का प्रथम उजास ढला है।
जब-जब मानव थक जाएगा,
तेरी गोद उसे पुकारेगी;
धरती की यह हरित प्रार्थना
युग-युग तक जग को सँवारेगी।
-अनिता चतुर्वेदी
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