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थामें रहना मेरा हाथ

                
                                                         
                            थामें रहना मेरा हाथ
                                                                 
                            

बरस रही थी रात गगन से,
भीग रहे थे सपनों के पात।
तब तुमने चुपके से बढ़कर,
थाम लिया था मेरा हाथ।

न कोई वादा, न कोई शपथ,
न शब्दों का कोई विस्तार।
बस हथेली की उस ऊष्मा ने,
दे दिया जीवन को आधार।

कलाई की घड़ी बता रही थी—
समय कभी ठहरता नहीं,
पर सच्चा साथ अगर मिल जाए,
फिर कोई सफ़र कठिन नहीं।

वर्षा की हर बूँद कहती थी—
दुख भी पल भर का मेहमान है,
जिसके संग विश्वास खड़ा हो,
उसका हर मौसम आसान है।

चूड़ियों की मधुर खनक में,
मन ने अनकहा गीत सुना।
तेरी उँगली की दृढ़ पकड़ ने,
जीने का फिर अर्थ चुना।

कीचड़, काँटे, पथरीली राहें,
सब पीछे छूट गईं उस क्षण।
जब तुमने यह कहे बिना ही,
दे दिया अपना अपनापन।

प्रेम हमेशा शब्द नहीं है,
न ही केवल मधुर इज़हार।
कभी किसी भीगी राहों में,
एक स्पर्श ही होता है प्यार।

यदि कभी जीवन की बारिश
फिर से आँसू बन बरसेगी,
बस इतना करना—छोड़ न देना,
यह हथेली फिर तरसेगी।

क्योंकि रिश्ते फूल नहीं जो
मौसम बदले, मुरझा जाएँ;
सच्चे रिश्ते वे दीपक हैं,
जो आँधियों में भी जगमगाएँ।

चलो यूँ ही जीवन भर,
हर कठिन डगर साथ निभाएँ;
समय बदल जाए चाहे,
पर हाथों की यह डोर न टूट पाए।
-अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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