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गज़ल — बारिश में याद आया

                
                                                         
                            गज़ल — बारिश में याद आया
                                                                 
                            

भीगती रात का जब भी सफ़र याद आया,
दिल को फिर कोई पुराना शहर याद आया।

बादलों की ओट से जब चाँद निकला चुपके,
उसके चेहरे का वही नूर-ए-नज़र याद आया।

एक बूँद आके ठहरी थी हथेली पर मेरी,
उसमें छुपा हुआ कोई असर याद आया।

राह सुनसान थी, बारिश भी बहुत तेज़ मगर,
हर क़दम पर तेरा जाता डगर याद आया।

खिड़की खोली तो हवा भीगी हुई आई थी,
तेरे आने का वही इंतज़ार याद आया।

रात भर शहर की बत्तियाँ चमकती रहीं,
दिल को फिर अपना ही टूटा जिगर याद आया।

जिसे भुलाने की कोशिश में गुज़ारी थीं रातें,
वक़्त बदला तो वही एक ख़बर याद आया।

आसमाँ चुप था मगर आँख में पानी था बहुत,
देखकर उसका भीगी नज़र याद आया।

अब भी बारिश में कोई नाम नहीं लेती मैं,
फिर भी दिल को वही बीता असर याद आया।

अनु, आज ये मौसम भी अजब निकला है,
दर्द सोया था मगर फिर हमसफ़र याद आया।

- अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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