आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक हाथ की दूरी

                
                                                         
                            एक हाथ की दूरी~
                                                                 
                            

बारिश की इन बूँदों में,
कुछ अनकहा-सा बहता है,
एक हाथ किसी हाथ को
चुपचाप पुकारता रहता है।

न शब्दों की कोई आहट,
न वादों का कोई शोर,
बस उँगलियों के बीच ठहरी
एक अधूरी-सी डोर।

वह हाथ बढ़ा तो था शायद,
कुछ पल थामने के लिए,
या भीगे मौसम में बिखरे
सारे ग़म बाँटने के लिए।

लेकिन बीच में समय खड़ा था,
कलाई पर पहरेदार बना,
हर पल अपनी चाल बताता,
फिर भी मन से बेख़बर रहा।

बारिश गिरती रही निरंतर,
हथेली भीगती जाती है,
जिस स्पर्श की आस बची है,
वह और दूर हो जाती है।

कितनी अजीब है मन की दुनिया—
पास होकर भी दूरी है,
बस एक हाथ की दूरी भर,
और पूरी उम्र अधूरी है।

काश कोई बूँद संदेश बने,
हथेली पर आकर ठहर जाए,
जो बात होंठ कह न पाए,
वह स्पर्श कहकर गुजर जाए।

फिर न घड़ी समय को बाँधे,
न राहों में कोई मजबूरी हो,
बस हाथों में हाथ रहे और
हर दूरी अपनी दूरी हो।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर