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दिल तो पागल है

                
                                                         
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दिल तो पागल है,
कहाँ मानता है बात,
कभी हँसता है चुपके से,
कभी रोता सारी रात।

तर्कों की दुनिया में
इसका कहाँ ठिकाना है,
जिसे आँखों ने देखा नहीं,
उसे भी अपना माना है।

कभी किसी की मुस्कान में
अपना संसार खोज लेता है,
किसी की एक नज़र पर
सदियों का प्यार सोच लेता है।

न दूरी इसे रोक पाती,
न समय इसे समझा पाता,
जिसे मन से चाह ले एक बार,
उसे भूल कहाँ पाता।

कभी उम्मीद के दीप जलाए,
कभी यादों में भीग जाता है,
टूटकर भी प्रेम की राह में
फिर मुस्कुराता जाता है।

शायद इसलिए तो कहते हैं—
इश्क़ हिसाब नहीं करता,
दिल जब किसी का हो जाए,
फिर खुद पर अधिकार नहीं करता।

दिल तो पागल है,
इसे पागल ही रहने दो,
प्रेम अगर सच्चा हो
तो इसे प्रेम ही कहने दो।
- अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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