आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

धरती, नदिया, रैना... और तुम

                
                                                         
                            धरती, नदिया, रैना... और तुम
                                                                 
                            
धरती की हरियाली में जब
जीवन मुस्कुराता है,
नदिया की हर लहर में जैसे
कोई गीत समाता है।
रैना चुपके से तारों की
चादर जब फैलाती है,
मन की सूनी देहरी पर
स्मृतियों के दीप जलाती है।
पर इन सबसे बढ़कर मुझको
एक एहसास सुहाता है,
जब तुम्हारा मौन स्नेह
मेरे मन को छू जाता है।
धरती देती धैर्य निरंतर,
नदिया बहना सिखलाती है।
रैना अपने शांत हृदय से
मन की थकन मिटाती है।
तुमने जीवन को अर्थ दिया,
विश्वासों का मान दिया।
सूनी राहों को अपनाकर
साथ निभाने का वरदान दिया।
इसीलिए यह सृष्टि सारी
मुझको अनुपम लगती है।
धरती, नदिया, रैना सुंदर—
पर तुमसे ही पूर्ण लगती है।
— अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर