धरती, नदिया, रैना... और तुम
धरती की हरियाली में जब
जीवन मुस्कुराता है,
नदिया की हर लहर में जैसे
कोई गीत समाता है।
रैना चुपके से तारों की
चादर जब फैलाती है,
मन की सूनी देहरी पर
स्मृतियों के दीप जलाती है।
पर इन सबसे बढ़कर मुझको
एक एहसास सुहाता है,
जब तुम्हारा मौन स्नेह
मेरे मन को छू जाता है।
धरती देती धैर्य निरंतर,
नदिया बहना सिखलाती है।
रैना अपने शांत हृदय से
मन की थकन मिटाती है।
तुमने जीवन को अर्थ दिया,
विश्वासों का मान दिया।
सूनी राहों को अपनाकर
साथ निभाने का वरदान दिया।
इसीलिए यह सृष्टि सारी
मुझको अनुपम लगती है।
धरती, नदिया, रैना सुंदर—
पर तुमसे ही पूर्ण लगती है।
— अनिता चतुर्वेदी
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