कुंतल कुटिल कपोलन ऊपर, बिंदी दमकै भाल,
अधरन अरुण अरुणिमा छिटकै, हँसि उठै रसाल।
नैनन की चितवन चंचल, मन हरि लेत निहारि,
चित्र-पट पर रूप सँवारति, सुकुमारी चित्रकारि॥
मृदु कर में रंगन की थारी, अँगुरी चलै सुहाय,
कनक-कांति कपोलन ऊपर, लाज सुधा बरसाय।
रेखा-रेखा रूप निखारै, रंग भरै अनुराग,
मानौ चित्र नाहिं, उर भीतर लिखि डारै प्रेम-सुहाग॥
वेणी कारी नागिन जैसी, अँचल चंदन-गंध,
मंद-मंद मुसकान बिखेरै, ज्यों फूले कदंब।
बन-उपवन की छाँह सुहानी, पवन बजावै तार,
चित्र-पट पर उतरि रह्यो है, यौवन को संसार॥
साम्हने बैठी बाल-सखी-सी, नैनन मधुर सलोने,
मौन अधर पर स्वप्न सजे हैं, मन के गुप्त खिलौने।
चित्रकारि की तूलिका ज्यों, छू ले मन के तार,
रंगन में मुसकातो बचपन, बनि सुंदर संसार॥
कौन कहै यह चित्रहि केवल, कौन कहै बस रंग,
इहमें तो दुई हिय मिलि बैठे, ज्यों मिलि उठी उमंग।
एक रचै रूप सलोनौ, दूजी छवि साकार,
पट ऊपर प्रेम लिखत है—ममता की चित्रकार॥
रंग सूखि जावैं चाहे सारे, छवि न होवै क्षीण,
ममता की जो रेखा खिंची, रहै सदा नवनीन।
चित्र रहै या मिटि जावै, भाव रहैं साकार,
जुग-जुग तक गावत रहैगी—ममता ही चित्रकार॥
- अनिता चतुर्वेदी
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