भुलाकर देख लें~
चलो आज एक बार
दिल से उन्हें भुलाकर देख लें,
यादों की हर पगडंडी पर
नए कदम बढ़ाकर देख लें।
उनकी हँसी की परछाईं
दीवारों से उतार दें,
भीगे हुए उन ख़तों को भी
वक़्त की धूप में बिखरा दें।
सोचें कि अब न कोई रिश्ता,
न कोई अधूरा ख़्वाब रहे,
मन के सूने आँगन में
बस अपना ही गुलाब रहे।
पर जाने क्यों संध्या ढलते
फिर वही आहट आती है,
बंद पलक के भी भीतर
उनकी सूरत मुस्काती है।
जितना उनको भूलना चाहूँ,
उतनी स्मृतियाँ गहरी हों;
जैसे सूखी धरती पर
पहली वर्षा ठहरी हो।
अब जी में है—
उनसे नाता तोड़ भी दूँ,
नाम हृदय से मोड़ भी दूँ;
पर यदि हर धड़कन में
उनका ही स्वर सुनाई दे,
हर मौसम उनकी खुशबू बन
पास चली आए—
तो फिर बताओ,
भुलाने की कोशिश करूँ,
या यादों को ही
अपना घर मान लूँ?
- अनिता चतुर्वेदी
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