घन-घन घिर आए नभ में
श्यामल, स्निग्ध सलोने मेघ,
वन-वीणा के मौन तार पर
गूँज उठा पावस का राग।
लाल छतरी के नीचे सिमटा
मानव-मन का नन्हा विश्वास,
किन्तु जलधाराएँ मुस्काकर बोलीं—
"मत घबराओ, हम जीवन की आस।"
टप-टप झरते मोती जैसे,
नभ ने खोला रत्न-भंडार;
हर बूँद लिखती रही धरा पर
स्मृतियों का अमिट विस्तार।
कदम्बों ने बाँहें फैला दीं,
आम्र-विटप ने ली अंगड़ाई;
भीगी दूब के हरित अधरों पर
नव मुस्कानों की रेखा आई।
पहली बूँद जब माटी चूमी,
महकी सौंधी-सी अभिलाषा;
लगा प्रकृति नव-वधू बनकर
ओढ़ रही हो मेघ-चुनरिया।
निर्झर, सरिता, ताल, तड़ागों में
गूँजा जीवन का अभिनंदन,
धूल-धूसरित पथ के माथे पर
बरसा शीतल अमृत-चंदन।
हर पत्ता हरियाली ओढ़े,
हर डाली नवगीत सुनाए;
भीगे पवन के कोमल स्पर्श से
सोया जीवन जाग उठ आए।
हे वर्षा!
तेरे मधुर, मंद्र निनादों में
मन का सारा क्लेश पिघल जाए;
सूखे अंतर के निर्जन वन में
फिर से हरियाली खिल जाए।
तू केवल जल नहीं, प्रकृति का
निर्मल, नित्य, पावन गान;
तेरी हर बूँद में धड़क उठती
धरती की शाश्वत मुस्कान।
- अनिता चतुर्वेदी
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