शब्दों के इस सुरम्य लोक में,
कुछ स्वप्न सँवरते हैं,
मन के अनकहे भाव यहाँ,
कविता बनकर झरते हैं।
कहीं कल्पना पंख पसारे,
नभ की सीमा छू आती,
कहीं हृदय की मौन व्यथा भी,
मधुर गीत बन जाती।
यह मंच नहीं केवल अक्षरों का,
यह संवेदन का आँगन है,
हर रचनाकार के अंतस में,
स्पंदित होता इक जीवन है।
कोई भावों की शीतल छाया,
कोई अग्नि उकेर रहा,
कोई अपने जीवन के पृष्ठों पर,
अनुभव लिखकर दे रहा।
अमर उजाला—नाम तुम्हारा,
जैसे प्रभात की पहली किरण,
जिससे आलोकित हो उठता है,
शब्दों का सारा उपवन।
यहाँ न कोई भाव पराया,
न कोई स्वर अनजाना है,
हर सृजन के पीछे छिपा हुआ,
एक अनमोल-सा अनुभव है।
कभी ग़ज़ल की नर्म रवानी,
कभी गीतों की मधुर तान,
कभी कहानी जीवन जैसी,
कभी कविता में मुस्कान।
विचारों के इस विस्तृत नभ में,
कितने सूरज खिलते हैं,
अलग-अलग स्वर होते फिर भी,
एक सुर में सब मिलते हैं।
यहाँ कलम को पंख मिलें तो,
उड़ती है अनंत दिशाओं में,
शब्द उतरते हैं चुपके से फिर,
मन की गहरी गहराइयों में।
जो कहना था कह न सके हम,
वह भी यहाँ कह पाते हैं,
अपने भीतर के मौसम को,
पंक्तियों में बरसाते हैं।
मैं भी लेकर अपनी कलम को,
इस चौखट तक आई हूँ,
मन में संचित कुछ अनुभूतियाँ,
अक्षर बनकर लाई हूँ।
इस साहित्यिक यात्रा में अब,
अपना भी विश्वास जुड़ा,
शब्दों से जो रिश्ता बनता है,
वह रिश्तों से कम कब हुआ।
नमन तुम्हें, हे काव्य-भूमि!
तुमने राह दिखाई है,
सूने मन के आकाशों में,
नव-आशा फिर जगाई है।
तुमसे जुड़कर लगता है—
शब्द अभी जीवित हैं,
भावों की इस दुनिया में,
सपने अब भी समीप हैं।
अमर उजाला! तुम केवल,
नाम नहीं—एक उजास हो,
शब्द-साधना के पथ पर तुम,
निर्मल-सा विश्वास हो।
कलम जहाँ भी सत्य कहेगी,
तुम उसका सम्मान रहोगे,
जब तक शब्दों में प्राण रहेंगे,
तब तक तुम पहचान रहोगे।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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