कपट-कलुष से मुक्त हृदय हो,
वाणी में माधुर्य रहे,
मन-वचन-कर्मों में जिसका
एकरूप साम्य रहे।
नहीं प्रदर्शन, नहीं प्रपंच हो,
नहीं अहं का भार रहे,
सत्य-सुधा से सिंचित मन में
करुणा का संचार रहे।
सरिता जैसे सहज बहे और
पथ की बाधा भूल जाए,
तरु जैसे निज शीतल छाया
सबको देकर सुख पाए।
पुष्प न माँगे गंध-वितरण का
कभी किसी से प्रतिदान—
ऐसी ही निष्काम सरलता
आर्जव की पहचान।
सत्य कहे, पर सत्य किसी के
अन्तर को न दग्ध करे,
वज्र-निश्चय धर्म हेतु हो,
हृदय कुसुम-सा स्निग्ध रहे।
मान मिले तो मद न जागे,
अपमान मिले तो क्षोभ न हो,
जय में उन्माद न हो मन में,
पराजय में लोभ न हो।
जब ‘मैं’ का आवरण विलीन हो,
‘मेरा’ भी जब दूर रहे,
तब अन्तस्तल के निर्मल नभ में
आत्मप्रकाश भरपूर रहे।
क्या लेकर आया मानव जग में,
क्या लेकर जाएगा?
धन, यश, पद सब यहीं रहेंगे,
सत्य ही साथ निभाएगा।
अन्तिम क्षण जब मौन खड़ा हो
जीवन के द्वार पर आकर,
तब अंतर पूछे—‘क्या पाया?’
उत्तर आए मुस्काकर—
‘निष्कपट रहा, सत्य जिया,
करुणा को अपनाया;
जैसा अन्तर्मन था मेरा,
वैसा ही जग को दिखलाया।’
यही सरलता दुर्बलता नहीं,
यही मनुज का मान—
अन्तर-बाहर एक हो जाए,
यही ‘आर्जव’ का ज्ञान।
न छल रहे, न कलुष रहे,
न स्वार्थों का अंधकार—
निर्मल मन, निष्काम हृदय हो,
सत्य-सुगन्धित व्यवहार।
जहाँ सरलता साधना बने,
जहाँ सत्य बने श्रृंगार—
वहीं मनुष्यत्व खिलता है,
वहीं ‘आर्जव’ साकार।
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