चलते-चलते कदमों से वक्त की मिट्टी उड़ रही है,
ज़िंदगी ख्वाबों की तरह आँखों से फिसल रही है।
हाथ खाली हैं मगर ख्वाहिशों का हुजूम है बाकी,
खामोश रहकर भी ये धड़कन कुछ कह रही है।
न ठहरने का इरादा है न लौटने का कोई रास्ता,
रेत की तरह ये उम्र बस बहती ही जा रही है।
समेट लो जो बची है यादों की महक दामन में,
कश्ती किनारे की चाह में मौजों से लड़ रही है।
जो कल हमारा था, वो आज बस एक साया है,
नए रास्तों पर अब पुरानी यादें मिल रही हैं।
शिकवे नहीं कोई इस मुसाफिर को इस सफर से,
धूप-छाँव के खेल में ही शाम ढल रही है।
-अनिला विर्णवे
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