मन तू इतना विचलित क्यूँ है,
डरा डरा सा, थका थका सा
अस्थिरता का दामन थामे ,
बुझा,बुझा सा, क्यूँ अड़ा हुआ है
खुद को समझाता क्यूँ इतना,
जो होता है,वह हो जाने दे
अवसादों को मिट जाने दे
तूफ़ानों को आने दे तू
हृदय पटल से टकराने दे
झंझावातों से घिर कर ही
ठौर- ठिकाना पायेगा तू
ठेस न जब तक लगेगी तुझको
राह नहीं दिख पायेगा
अपने कब हो जाते पराये
जान कभी ना पायेगा
मुश्किलों से जूझ जूझ कर
ख़ुशियों का प्रकाश ढूँढ तू
ग़म की पहर, जब बीतेगी
ख़ुशियों की उमर, लग जायेगी
ख़ुशियों की उमर, लग जायेगी।।
अनिल
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