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हाँ, मैं ज़िंदगी को यूँ ही जीत जाता हूँ।

                
                                                         
                            ज़िंदगी के सफ़र में यूँ ही मुस्कुराता हूँ, कभी अपनों से, कभी ख़ुद की ज़िंदगी से टकराता हूँ। हारकर भी मैं ख़ुद को जीत दिलाता हूँ, हाँ, मैं ज़िंदगी को यूँ ही जीत जाता हूँ।
                                                                 
                            
ज़िंदगी की शाख़ पर कभी घबराता हूँ, फिर गिरकर उठता हूँ, नया रास्ता बनाता हूँ। हर ठोकर को अपनी मंज़िल का सबक़ बनाता हूँ, हाँ, मैं ज़िंदगी को यूँ ही जीत जाता हूँ।
ज़िंदगी, क्यों इतना इम्तिहान लेती हो? मुझे सबके साथ रखकर, सबसे दूर कर देती हो। फिर मेरे जज़्बातों को अपने नाम कर लेती हो, हाँ, मैं ज़िंदगी को यूँ ही जीत जाता हूँ।
फिर मुझे ज़िम्मेदारियों के तराज़ू में तौल देती हो, और अपने प्यार की ओर झुका देती हो। हर दर्द में जीने का हौसला सिखा देती हो, हाँ, मैं ज़िंदगी को यूँ ही जीत जाता हूँ।
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2 महीने पहले

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