हाँ, मैं बस्ता लेकर निकल जाता हूँ,
ज़िंदगी के मोड़ पर।
सूरज की पहली किरण को छुपाकर,
अरमानों के चार पहियों पर,
फ़ुर्सत को ख़्वाहिशों में बदलकर।
उम्मीदों का बोझ अपने कंधों पर लेकर,
ख़्वाहिशों और अरमानों को समेटकर,
निकल जाता हूँ ज़िंदगी के मोड़ पर।
फिर अपनी आरज़ू को अपनी क़िस्मत पर छोड़कर,
राहों को मंज़िल तक पहुँचाने की होड़ में,
निकल पड़ता हूँ ज़िंदगी के सफ़र पर।
किसी का साथ और किसी की नफ़रत,
अपने में समाकर।
मेहनत की क़ीमत समझना इतना आसान नहीं,
लोग बदलते हैं, इसका कोई हिसाब नहीं।
फिर भी मैं हिम्मत नहीं हारता हूँ,
अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह नहीं मोड़ता हूँ।
लोगों की इच्छाएँ बहुत हैं इस जीवन में,
पर सबको समझना हर किसी के बस की बात नहीं।
फिर भी मुस्कुराता हूँ,
अपनी ज़िम्मेदारियों के नज़ारे छुपाकर,
दूसरों की उम्मीदों को सजाकर।
फिर सूरज की किरणें छुपा लेता हूँ,
आसमान की छाँव में।
फिर निकल पड़ता हूँ
अपने आशियाने की ओर,
बस्ता अपने कंधों पर उठाकर।
ज़िंदगी के इस सफ़र में,
अपने हमसफ़र को लेकर,
हाँ, मैं बस्ता लेकर निकल जाता हूँ।
— अनिल शाह
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