कितने टूटे हुए से ख्वाब लिए बैठे हैं
शाम से परवाने बुझे चिराग़ लिए बैठे हैं
जिनको परवाह किसी बात की होती भी न थी
लोग वही आज कुछ सवाल लिए बैठे हैं
चाल में जिनके कई मंजिलों की आहट थी
वो मुसाफिर भी थके पांव लिए बैठे हैं
धूप जिनका कभी सरमाया हुआ करता था
वो खुद अवारा बादलों की छाँव लिए बैठे हैं
जिनकी किस्मत में मोहब्बत के साए भी नहीं
कितने अपने टूटे दिल में ऐतबार लिए बैठे हैं
क्या क्या धोखे न मिले हमको इस दुनिया में
और हम क्या क्या सब्जबाग लिए बैठे हैं
है नहीं गम हमें हासिल बुझे चिराग़ हुए
हम अपने दिल में बहुत आग लिए बैठे हैं
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