कुछ अलग से और क्या कर पाओगे
जो है तुममें कुछ वही दिखलाओगे
पत्थरों की भीड़ के हो दरमियान
पत्थरों से सर तो ना टकराओगे
जिंदगी का सफर छोटा भी नहीं
फिर चलोगे,और फिर रुक जाओगे
दरिया को क्या कश्तियों की जुस्तजू
पार होगे या फना हो जाओगे
यूँ तौलता है परिन्दा फिर अपने पर
लग रहा है आसमां छू आओगे
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