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ऐतबार के काबिल नहीं मिला

                
                                                         
                            कोई तो ऐतबार के काबिल नहीं मिला
                                                                 
                            
जिस क़त्ल में एक भीड़ थी कातिल नहीं मिला
आगाज सब अंजाम तक पहुंचने से रहे
अय्यारियों में गुम था मुसाफिर नहीं मिला
उन हौसलों की कश्ती कभी डूबी भी नहीं
तूफान ऐसा आया फिर साहिल नहीं मिला
था दिलफरेब सा हरेक शख्स ख्वाब सा
नजरें मिलीं कभी तो मगर दिल नहीं मिला
उस शहर में हरकोई तिजारत में था मशगूल
मुझसा कोई जो खुद से हो गाफिल नहीं मिला
कुछ ख्वाब हकीक़त में न तब्दील हो सके
वो ग़म था जिसमें कोई भी शामिल नहीं मिला
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एक महीने पहले

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