फिर कभी मिला नहीं मुझसे उसी बेताबी से
रह गया था मैं जरा सा दूर कामयाबी से
रंग दिखाओगे तुम भी ये मुझे मालूम था
तआरूफ करा दिया था अपनी हर खराबी से
हारकर इस खेल में, हंसकर जब मैं चला
वो जीतकर खड़े रहे हारे हुए जुआरी से
जिंदगी ने सौंप दिया अपना जब सब हमें
हमें शर्म आने लगी अपनी वफादारी से
चाहतें शीशे की तरह टूटकर टुकड़े हुईं
कीरचें दिखाने लगीं अक्स दुनियादारी के
बादलों की हकीक़त, खुल गई है बारिश में
तेवर लगते थे जिनके पहले इंकलाबी से
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