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बदलना पड़ा मुझे

                
                                                         
                            खुद में जुनून पैदा करना पड़ा मुझे
                                                                 
                            
मैं गुल हूं इस वहम से मुकरना पड़ा मुझे
हर सांस जिस दुनिया से मुखालिफ रहे आए
हर काम उसकी तर्ज पर करना पड़ा मुझे
हसरत लिए फूलों की महक की, दीदार की
कांटों भरी राहों से गुजरना पड़ा मुझे
किरदार के तकाजे पत्थरदिल बना गए
ख़्वाबों में ही शीशे में उतरना पड़ा मुझे
गर्दिश की ताप से जो उड़े जिंदगी के रंग
लहू के रंग से सभी भरना पड़ा मुझे
जब मन के मुआफ़िक चले,हालात भी बिगड़े
खातिर जमीर के फिर सुधरना पड़ा मुझे
हम आफताब की तरह रौशन न हो सके
पर शबे वक्त फिर भी ढलना पड़ा मुझे
सोचा था कि बदलेंगे,तुम्हारे का कभी ख्याल
बदले न तुम तो खुद को बदलना पड़ा मुझे
गैरों की बात क्या थी,खुद से कभी कभी
अपने वजूद के लिए लड़ना पड़ा मुझे
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2 महीने पहले

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