फूल खिल उठे हैं खिजाओं में
ताजगी इतनी है इन हवाओ में
मैं उजड़कर भी आबाद रहा
वो असर था तेरी दुआओ में
पाकर मंजिल मुझे वो भूल गया
मुंतज़िर हम थे जिसके राहों में
दस्त में रास्ते हरगिज न मिलें
पर घुटन सी भी थी पनाहों में
जो हकीकत में देखता भी नहीं
ख्वाबों में आ जाता भी है बाहों में
तरक्की करके भी रहता है इंसान
शक की खुदगर्जी की गुफाओं में
आज आँधियों के हैं आसार बहुत
रात भर सिर्फ चर्चा रही चिरागों में
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