काजल अश्कों से धुल गया होगा
गुजरता वक्त रुक गया होगा
शोख हवाएं शरारती तो नहीं
ये चिराग़ खुद ही बुझ गया होगा
देखकर खुद सा जमीं पर तुझको
चांद बादलों में छुप गया होगा
वो गुजर आया जहां जहां से भी
फिजाओं में जादू घुल गया होगा
आज तक खिड़की भी बंद रहती थी
अब दरवाजा भी खुल गया होगा
आते देखकर मुझे महफिल में
वो आहिस्ते से निकल गया होगा
सच बताना क्यों पी रखी तूने
दर्द दिल का न कम हुआ होगा
ये शहर है हसीन शरीफों का
मुसाफिर खुशी से लुट गया होगा
ये कयास है या हकीकत कोई
बिना धुआं दम घुट गया होगा
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