क्यों हवा ऐसी चली है
ये फ़िज़ा भी मनचली है
पढ़ रही है खुशबूओं को
वो अभी कच्ची कली है
याद कोई आ न जाए
रात बस थोड़ी ढली है
देर से क्या ढूंढते हो
क्या मेरे पैरों डली है
मैं भी कैसा आदमी हूं
अब ये चर्चा हर गली है
लग रही खुदगर्ज दुनिया
तुम तो कहते थे भली है
उठ रहा सीने से धुआं
चीज कोई तो जली है
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