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ढूंढ रहा अपनी गैरत को

                
                                                         
                            प्यार किया मैंने कुदरत को
                                                                 
                            
क्या करता अपनी फितरत को
देख देख औरों की हालत
बचा रहा अपनी अस्मत को
तेरे बावत क्या क्या लिखकर
टुकड़े कर डाला कागज को
मुझको सफर यह रास न आया
सोच रहा हूं जाऊं घर को
कितना जुदा है तू औरों से
देख रहा हूं तेरे दर को
तुम जब पहली बार दिखे थे
याद करता हूं उस मंजर को
प्यास का अब एहसास हुआ है
छोड़ आया जब हर शरबत को
सब कुछ खोकर इस दुनिया में
ढूंढ रहा अपनी गैरत को
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एक महीने पहले

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