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सवाल आए थे

                
                                                         
                            किन पत्थरों पर दिल उछाल आए थे
                                                                 
                            
नाशुक्रों पर खुद को निसार आए थे
ग़मों की आग से गुजरे रहे आए जिंदा
हमारे खून में अक्सर उबाल आए थे
मेरी खामोशी पर ताउम्र है अफसोस मुझे
हमारे पास सब तेरे सवाल आए थे
जहाँ नामों निशां औरों के मिट जाते हैं
हम ऐसे दौर से खुद को निकाल लाए थे
वो देखने का शौक, पलक तक नहीं झपकी
यूँ नाजुक आंखों में कितने ही बाल आए थे
चलो फिर देखना है शहर के हालात हमें
हुई मुद्दत कि जिन्हें हम सम्हाल आए थे
तुम्हें छू लूं तो हाथ जल नहीं जाएं मेरे
हमारे मन में ये अक्सर खयाल आए थे
कशिश की इम्तिहां,दरिया में डूबे, उतराए
बदन फिर रूह पर सुनहरे जाल आए थे
शहर को फिर से बसाने में मशक्कत होगी
यहां के जर्रे जर्रे लम्हा लम्हा भूचाल आए थे
उजाले को आखिर सूरज का इंतजार हुआ
कई जुगनू, कई दीए, कितने मशाल आए थे
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2 महीने पहले

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