आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अब तो ज्यादा असर नहीं होता

                
                                                         
                            दर्द उठता है बहुत घावों से
                                                                 
                            
नींद आती है अब दवाओं से
बेवफाई का सिला देता रहा
मैं न जाने भी क्यों वफाओं से
ख्वाब पलकों पे सजाता मैं रहा
वो कुचलता ही रहा पांवों से
धूप बारिश ने जान ही ले ली
तंग आया जो घर छांवों से
जान जोखिम में दीए की थी
बात करता रहा हवाओं से
जुर्म पर जुर्म कोई करता रहा
मैं भी बचता रहा सजाओं से
अब तो ज्यादा असर नहीं होता
मर मिटे थे इन्हीं अदाओं पे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
15 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर