दर्द उठता है बहुत घावों से
नींद आती है अब दवाओं से
बेवफाई का सिला देता रहा
मैं न जाने भी क्यों वफाओं से
ख्वाब पलकों पे सजाता मैं रहा
वो कुचलता ही रहा पांवों से
धूप बारिश ने जान ही ले ली
तंग आया जो घर छांवों से
जान जोखिम में दीए की थी
बात करता रहा हवाओं से
जुर्म पर जुर्म कोई करता रहा
मैं भी बचता रहा सजाओं से
अब तो ज्यादा असर नहीं होता
मर मिटे थे इन्हीं अदाओं पे
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