हम निशाने पर रहे अपनों के, और बेगानों के
इक जमीर खटकता रहा सभी की आखों में
सभी ग़मख़्वार से मिलते थे हमसे लेकिन
जब कुछ जरूरत हुई तन्हा रहे ख़िज़ाओं में
न वो सुरूर न वो दीवानगी की हद ही मिली
कमी कुछ मुझमें रही कुछ शहर के मैं खानों में
जानने वालों की भीड़ में कभी सुकून न था
चैन से रहना मुनासिब न था अनजानों में
आसमानों से जो मुश्किल से कभी मिलता है
हम गाफिल खोजते रहे ,जमीन के समानों में
छोड़ के हसरतें सब जब हो गए ठिकाने हम
मुफलिस दुनिया गिना करती है बादशाहों में
वो भरम और ये करम महज इत्तेफाक न था
हमको जो मिल गया मिलता नहीं दुकानों में
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