ये इम्तहान बताकर कभी नहीं होता
बरसते हैं कभी बादल बिना आवाज किए
हकीकतों में जो करना नहीं मुनासिब था
ख्यालों में भी कुछ हमने शहर आबाद किए
अंधेरों में छुपी थी रोशनी की उम्मीदें
हमारे शहर ने जंगल बहुत बर्बाद किए
जो हमने खो दिया पाना नहीं हुआ मुश्किल
देखा तकदीर को सबने हमें आदाब किए
कोई हिम्मत कोई मेहनत कोई किस्मत भी
मुझे मिलती रहीं,अपने बहुत सौगात लिए
कभी टूटे कभी उजड़े मगर जज्बात लिए
रहे मैदान में हम खुद को अपने साथ लिए
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