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जिंदगी स्वीकार कर लेती है सबकुछ

                
                                                         
                            जिंदगी स्वीकार कर लेती है सबकुछ
                                                                 
                            
और कुदरत भी हमें देती है सब कछ
चढ़ते,ढलते धूप की क्या है हकीकत
सिर्फ परछाईं बता देती है सब कुछ
किस तरफ चलना है,मुड़ना है कहां पर
ये हमें तकदीर कह उठती है सब कुछ
चाहतों के काफिले खुद पर थमें तो
मंजिलों ने खुद कहा हासिल है सब कुछ
खुद को खोकर हम सभी कुछ खो चुके थे
खुद को खोजा और पाया हमने सबकुछ
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59 मिनट पहले

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