दुनिया में हर किसी को बस खुशी की चाह है
इन्सान मगर ग़म के महल में तबाह है
वह फूल जो किताब में दिखा है अर्से बाद,
गुजरे हुए लम्हों का अकेला गवाह है
गुनाह हमसे हो रहे हैं अफसोस है मगर
हमपर हुआ भी जुल्म कहीं बेपनाह है
तकदीर की अंधी गली में भीड़ बेशुमार
तदबीर के अंगारे बिछी सूनी राह है
हम बेतकल्लुफी में ठुकराए गए वहां
मकसद बिना भी मिलना जहां पर गुनाह है
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