आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गुनाह है

                
                                                         
                            दुनिया में हर किसी को बस खुशी की चाह है
                                                                 
                            
इन्सान मगर ग़म के महल में तबाह है
वह फूल जो किताब में दिखा है अर्से बाद,
गुजरे हुए लम्हों का अकेला गवाह है
गुनाह हमसे हो रहे हैं अफसोस है मगर
हमपर हुआ भी जुल्म कहीं बेपनाह है
तकदीर की अंधी गली में भीड़ बेशुमार
तदबीर के अंगारे बिछी सूनी राह है
हम बेतकल्लुफी में ठुकराए गए वहां
मकसद बिना भी मिलना जहां पर गुनाह है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर