अक्सर दूसरी दुनिया में चला जाता हूं
लौट कर वापस जमीं पे उतर आता हूं
जो भी हासिल हुआ नहीं इस दुनिया में
वो सभी चीजें खयालों में बहुत पाता हूं
काबिल रहने के, है या नहीं है ये दुनिया
सोचते सोचते दुनिया में जिए जाता हूं
आशिकी, रंजिशें, ठोकरें, शोहरतें यहां
जो मिल जाता है बेशर्त लिए जाता हूं
ओस की बूँदों सा,पत्तों से लुढ़ककर मैं तो
धूल की गोद में हर सुब्ह सिमट जाता हूं
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