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मैं हकीक़त नहीं तस्वीर हकीकत की हूं

                
                                                         
                            आईना सा मुझे कुदरत ने बनाया क्यों है
                                                                 
                            
सामने जो है उसका अक्स नुमाया क्यों है
आते जाते ठहर के लोग देखते हैं मुझे
ऐसा इल्ज़ाम सबने मुझपे लगाया क्यों है
टूट जाऊं न मैं इस बात की तस्दीक करो
पत्थरों ने इधर फिर सर को उठाया क्यों है
मैं हकीकत नहीं तस्वीर हकीकत की हूं
आग पानी में लगाकर न बुझाया क्यों है
वो जो जाहिर में मुझसे मुंह घुमा के रखता है
मेरी तस्वीर को सीने से लगाया क्यों है
तुम तो हर बात में कहते हो कोई बात नहीं
बात ऐसी है तो बोलो न खुदाया क्यों है
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59 मिनट पहले

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