आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेवफ़ा होकर भी दुआ देती है

                
                                                         
                            दस्त ए तन्हाई भी किस किस को सदा देती है
                                                                 
                            
जिंदगी अब बेवफा होकर भी दुआ देती है
अब हवा चलने लगी अब न ये चराग़ बुझे
इसकी गुस्ताखियां परदे भी उड़ा देती है
कोई नाचीज कब नजरों को लुभा लेती है
मुझको अपनी अना नज़रों से गिरा देती है
अश्क बेवक़्त ही आंखों में उतर आते हैं
बेख़याली हमें बेवक़्त रुला देती है
आजमाइश हुई इस बार मेरी किस्मत की
जो खयालों में भी तुमको ही बुला लेती है
जिस्म से रूह तक का सफर मुश्किल था जरा
मंज़िलें राही के कुव्वत का पता देती हैं
आग से खेलने का शौक हमें था ज्यादा
ऐसी लगी रौशनी कम ज्यादा धुंआ देती है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर