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                            पोशाक जंग जू की रफ़ू हो रही है क्या
                                                                 
                            
कुव्वत हमारी अब भी कहीं सो रही है क्या
कैसा मलाल है कि हैं नजरें बुझी बुझी
जो मिल न सका जिंदगी वो खो रही है क्या
कश्ती में अकेला हूं तो फिर शोर है कैसा
कोई लहर इस नाव को डुबो रही है क्या
अपना शगल था किसी भरोसे तो नहीं थे
गर्दिश मेरी बर्बादियाँ संजो रही है क्या
अब काम तो आएगा ये जुनूने इंकलाब
कोई वजह आंखें तेरी भिगो रही है क्या
जो घाव भर गए हैं रह गईं निशानियां
वो यादें अब भी नश्तरें चुभो रही हैं क्या
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2 महीने पहले

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