कुछ गुलों ने जिंदगी महका दिया
काँटों ने भी कुछ तजुर्बा सा दिया
जिंदगी की डोर थी सीधी मिली
आदमी ने खुद इसे उलझा दिया
कोशिशों से बात बन पाई न जब
हमने अपने आप को समझा लिया
आंधियों ने खटखटाई कुंडियां
और दीवाना हुआ जलता दिया
कह रही थी जिंदगी आराम कर
पर हमीं ने खुद हमें उकसा दिया
मंज़िलें सब गुम थीं मुश्किल राहों में
जो भी पहुंचा उसने ये पता दिया
खुदकुशी की सोचते भी हम नहीं
पर मीनारों में लगा दो जालियां
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