अँधेरी रातों में किस शौक से रहे जलते
सहर हो जाने पर भी खुद दीए नहीं बुझते
खुली जब नींद तो ख्वाब से निकलना पड़ा
हकीकत देखते हैं आंखों को मलते मलते
किया जो गौर तो खुद को अकेला पाया
बिछड़ते गए सभी हमकदम चलते चलते
वीरान आंखों में कैसे गुजारा भी होता
सभी मुरझाते गए ख्वाब जो रहे पलते
जो साथ हमनवां हो वक्त कब ठहरता है
गुजरता जा रहा है दिन भी ये ढलते ढलते
शहर में भीड़ है ज्यादा बे रीढ़ लोगों की
खड़े रहना जो भूल गए हैं झुकते झुकते
जो साथ वक्त के चलते तो होते शोहरत में
किनारे लगते साथ दरिया के बहते बहते
पनाहगार रही है बहुत मजलूमों की
ईमारत गमजदा दिखती रही ढहते ढहते
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