उल्फ़त हो या नफरत हमें बेपनाह हुआ
इक दफा चलो होता, यही बार बार हुआ
वक़्त का जो दरिया था वो वजूद मेरा था
कभी खौफनाक हुआ, कभी ख़ाकसार हुआ
इस दिल की तबियत अब अजीब रहती है
अभी ये बेजार हुआ, अभी बेकरार हुआ
इश्क़ के समन्दर की बात ही निराली है
इसमें जो डूब गया, सिर्फ वही पार हुआ
क्या छुपा रखा दिल में,हमसे भी अब पर्दा
क्यों हमको बेगाना रखा, गैर राजदार हुआ
वो ख्याल, जो तुझे देखकर उठा दिल में
उल्फ़त के रंग कई, पा कर अशआर हुआ
गुलशन बिराना था वक्त ने वो करवट ली
खिल उठा हरेक गुंचा, मौसम गुलजार हुआ
वो वहम की धूप कड़ी पड़ी हर नमी सूखी
दिल फटा हुए टुकड़े, हर जगह दरार हुआ
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