सुंदरता गुणों से फलती है,
सुंदरता पर्दे में रहती है,
बाहरी चमक-दमक,
कुछ पल से,
कुछ समय की है, यह लहक,
देखो समझो:-
पेड़ों की जड़ों का पर्दा,
पेड़ों की जड़ों का टेड़ापन,
पेड़ों की जड़ों का आत्मसमर्पण,
पेड़ों की जड़ों का आत्मसंघर्ष,
पेड़ों की जड़ों का गहरा असर,
पेड़ों की जड़ों का अंदरूनी सफर,
पेड़ों की जड़ों का अमर-एहसास,
बाहर लगता सब कुछ हरा-भरा,
सुंदरता का स्रोत रस-भरा,
समझ ऐ चंचल मन,
सुंदरता का तन,
पेड़ों की जड़ों से जुड़ा,
कर ले कदर आत्मसमर्पण की ।
सत्य स्रोत के टेडेपन में ही,
सुंदरता बनती बिगड़ती है।
मन की चंचलता में सुंदरता,
बाहर जन्मती है।
जबकि सुंदरता गुणों से जन्मती है।
-अनिल मीणा
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