मैं ज़िंदगी लिखता हूँ
मन से लिखता हूं,
तन से लिखता हूं,
धन से लिखता हूँ,
पर,
जो भी लिखता हूँ,
इन सब में जीवन लिखता हूँ,
अपना लिखता हूँ,
परायों का लिखता हूँ,
पर, जो भी लिखता हूँ,
इन सब से अलग है,
वह भी लिखता हूँ,
लिखने का मन करता नहीं,
पर,
भावों का वेग जब उमड़ता है,
तन-मन में,
तब,
मन से, तन से और धन से,
ऊपर उठकर लिखने का,
हृदय संवेदन हो मचलता है,
तब अपने आप मैं लिखता हूँ,
सागर की लहरों-सा,
आसमान की नीलिमा-सा,
पतझड़ के रूखेपन-सा,
सावन की हरियाली-सा,
बसंत के नवजीवन प्रस्फुटन-सा,
मैं लिखने लगता हूँ,
कभी उत्सवों में,
कभी त्योहारों में,
मन से लिखता हूँ,
कभी तन से लिखता हूँ,
कभी धन से लिखता हूँ,
लिखता हूँ,
जब निस्वार्थ भाव को लिखता हूँ,
टूटे हुए धागे को,
टूटे हुए बंधन को,
जोड़ने के लिए,
लिखता हूँ,
विरही के प्रेम मिलन और बिछुड़न के समय को, लिखता हूँ,
लिखता हूँ, अमीरी और गरीबी की हँसी खुशी और गम को,
पर दिल से लिखता हूँ,
मन से लिखता हूँ,तन से लिखता हूँ, धन से ऊपर उठकर लिखता हूँ,
-अनिल मीणा
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