आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैंने उड़कर बादलों को पकड़ा

                
                                                         
                            मैंने उड़कर बादलों को पकड़ा,
                                                                 
                            
या यूँ कहूँ—पकड़ने की ज़िद की।
नीले गगन की अनंत राहों में
मैं अपने सपनों के पंख फैलाए उड़ चला।
ऊपर, बहुत ऊपर,
जहाँ हवाएँ गीत गाती हैं
और सूरज सुनहरी मुस्कान बिखेरता है,
वहीं मिले मुझे कुछ शैतान बादल।
वे कभी हाथ की पहुँच में आ जाते,
तो कभी हँसते हुए दूर निकल जाते।
मैं उन्हें देखता, पुकारता,
अपनी हथेलियाँ उनकी ओर बढ़ाता,
पर वे हर बार मेरी उँगलियों से फिसल जाते।
लगता था जैसे वे कह रहे हों—
"हमें पकड़ना इतना आसान नहीं,
हम तो आज़ादी की साँस हैं,
हवा की मस्ती हैं,
आकाश का अनंत संगीत हैं।"
मैं थका नहीं,
बस मुस्कुराकर उनके पीछे उड़ता रहा।
क्योंकि उस दिन समझ आया—
सपनों की असली ख़ूबसूरती
उन्हें मुट्ठी में कैद करने में नहीं,
उनके पीछे उड़ते रहने में है।
आज भी जब आसमान में
वे शरारती बादल दिखाई देते हैं,
मैं मुस्कुरा देता हूँ।
जानता हूँ,
वे शायद कभी मेरे हाथ न आएँ,
लेकिन मेरी कल्पनाओं के साथी बनकर
हर बार मुझे
थोड़ा और ऊँचा उड़ना सिखा जाते हैं। :::
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर