*सुप्त हुई*
कैकयी-मंथरा न लुप्त हुई,
आज भी कुमति में गुप्त हुई।
आज भी कर रही हैं वनवासी,
रममय मेधा है सुप्त हुई।।
-पंडित अनिल
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