ज़िंदगी में खुशी आती है सुहागन बन के
और फिर ज़िंदगी को डँसती है नागन बनके।
जिसकी खातिर कभी ख़त लिखते ही इतराए मियाँ
अब उसी के लिए दिल आज हैं दुश्मन बन के।
जब भी होठों ने हँसी दोस्त सजानी चाही
एक मायूस घड़ी आ गई सौतन बन के।
मैं भी घिस-घिस के बदन रोज चमक जाता हूँ
जब कि जाना है पता है इसे जोगन बन के।
झूठ का रंग अनिल तेरा उतर जाएगा
तेरी करनी तुझे धोएगी जब धोबन बन के।
~पंडित अनिल
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