शूर वही जो सत्य की खातिर,
आँधी से टकराता है,
रण हो चाहे जीवन-पथ हो,
पीछे नहीं हट पाता है।
सुर वही जो मन में उतरे,
जैसे कोई दिव्य पुकार,
जिसके स्वर से सूना-सूना मन भी,
खिल-खिल जाता हो।
सूर भले ही आँखों से वंचित,
फिर भी राह दिखाता है,
बाहर का अँधियारा क्या है—
भीतर दीप जलाता है।
शूर बने तो कर्म सँवरे,
सुर सधे तो मन मुस्काता है,
सूर बने तो अंतर्मन में
ज्ञान सूर्य उग जाता है।
तीनों शब्द हैं अलग-अलग हैं,
पर गहरा मेल मिलाता है।
शूर हृदय, सुरमय जीवन,
सूर पादाक्ष कहलाता है।
-पंडित अनिल
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