आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सवाल मुझपे

                
                                                         
                            सवाल मुझ पे उठाया तो दोस्त रो बैठा
                                                                 
                            
गले से उनको लगाया तो दोस्त रो बैठा।

अजीब शह्र के हैं लोग गुम सभी खुद में
किसी को पास न पाया तो दोस्त रो बैठा।

पता किसी को नहीं जो भी मुझ पे ग़ुजरी है
उसे जो हाल बताया तो दोस्त रो बैठा।

तमाम उम्र लगा दी जिसे बनाने में
वो घर मैं छोड़ के आया तो दोस्त रो बैठा।

न जाने कैसी है किस्मत अनिल कि अपनों ने
मुझे शिकार बनाया तो दोस्त रो बैठा।
-पंडित अनिल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर