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जैसे थक गई हों राहों में चलते-चलते।

                
                                                         
                            धूल से भरी थीं पेड़ों की पत्तियाँ,
                                                                 
                            
जैसे थक गई हों राहों में चलते-चलते।
फिर बारिश की बूंदें आईं,
ममता से उन्हें छूते-छूते।

बूंदों ने जब धूल को धोया,
हर पत्ता खिलखिला उठा,
हरी-हरी सी मुस्कान लिए
जैसे प्रकृति ने श्रृंगार किया।

टप-टप बूंदें गिरती रहीं,
पत्तों पर मोती बनकर,
सूरज की हल्की किरण पड़ी तो
चमक उठे वे सोने-सा तनकर।

कितना सुंदर संदेश है इनमें—
जीवन चाहे कितना भी मुरझाए,
प्रकृति की एक बूंद प्रेम की
उसे फिर से मुस्कुराए।

धूल हटे तो चमक दिखे,
मन से मैल हटे तो प्रकाश;
बारिश केवल पानी नहीं,
यह प्रकृति का सुंदर विश्वास। 
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एक महीने पहले

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