इसका मलाल है नहीं मुँह मोड़ कर गया
जो जितना तोड़ पाया मुझे तोड़ कर गया।
रिश्ता लहू का आँख में देता लहू है दोस्त
रिश्ता वो सिर्फ नाम का है जोड़ कर गया।
किस पर करूँ यक़ीन अनिल आँख मूँद कर
जिस पर किया यक़ीं वो जड़ें कोड़ कर गया।
इतने तो दोष थे नहीं जितने का ज़िक्र है
सर मेरे दोस्त ठीकरा सब फोड़ कर गया।
-पंडित अनिल
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