दुर्गे!दुर्गतिनाशिनी हो पर क्षमा करो महारानी।
मेरे ऊपर जाने कैसी नज़र हुई वरदानी।।
मैं घातक ब्रह्मास्त्र से हरदम घिरा रहा,
निशिवासर तुम्हरी चरणों में पड़ा रहा।
लेकिन व्याकुल मन में बढ़़ती गई व्यथा,
पूजा जप-तप क्या जानूँ सब हुई वृथा।।
घर भी लगता है जैसे रणक्षेत्र भवानी।
दुर्गे दुर्गतिनाशिनी हो पर क्षमा करो महारानी।
मानव मन से कुटिलाई जाना नहीं संभव,
तुम तो हो जग जननी क्या है तुम्हें असंभव।
शत्रुनाशिनी गाता रहा मैं कथा तुम्हारी,
लेकिन अंत:शत्रु से है अब बुद्धि हारी।।
मैं हो सकता नहीं मुनि-विज्ञानी ध्यानी।
दुर्गे!दुर्गतिनाशिनी हो पर क्षमा करो महारानी।।
जीवन-मरण है हाथ तुम्हारे दो जीवन या मारो
नाव डुबा दो भवसागर में या फिर पार उतारो।
हूँ भयभीत अकिंचन स्वर्ण-रजत भेंट है मुश्किल,
घोर तमस है मन के भीतर रहता है मन आकुल।।
आकर प्रतिमा के समक्ष तो मौन है रहती बानी।
दुर्गे!दुर्गतिनाशिनी हो पर क्षमा करो महारानी।
~पंडित अनिल
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