ज़ख़्म मेरा मुस्कुराता रह गया
प्यार का किस्सा अधूरा रह गया।
लोग मुझको गुदगुदाते रह गए
और मैं आँसू छुपाता रह गया।
मेरी क़िस्मत में तमाशे हैं बहुत
क्या पता मैं हूँ कहाँ का रह गया।
प्यार जतलाता भी क्या मैं कम नसीब
होठ मेरा कँपकँपाता रह गया।
सामने मेरे उड़ी खिल्ली मिरी
और मैं था बस ठगा-सा रह गया।
-पंडित अनिल
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